नक्सलवाद और आतंकवाद एक जटिल समस्या बन चुकी है। यह दोनों ही देश की जड़ों को खोखला कर रहे हैं। दोनों ही समस्याएं देश के लिए नासूर बनती जा रही है। आए दिन हो रहे हमले देश की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगा रहे हैं। यह दोनों वाद मिलकर देश की वादी को मैला कर रहे हैं।
हाल ही में छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलियों ने सीआरपीएफ पर हमला किया, जिसमें 25 जवान शहीद हो गए। यह नक्सली अक्सर सीआरपीएफ के साथ खूनी खेल खेलने में सफल होते हैं। बहुत समय से कहा जा रहा है कि सीआरपीएफ को छापेमार लड़ाई का अनुभव नहीं है लेकिन इसके लिए कुछ किया नहीं जा रहा है। क्या यह कारण माना जा सकता है कि नक्सली हमेशा सीआरपीएफ को ही अपना निशाना बनाते हैं। क्योंकि वह बखूब ही जानते हैं कि वह उनके हमले का जवाब नहीं दे पाएंगे। अगर ऐसा है तो इस बल को इसके लिए तैयार करना बहुत ही आवश्यक है। नहीं तो वहां नक्सली ऐसे ही सफल होते रहेंगे। नक्सली हमेशा अपने मंसूबों में कामयाब होते हैं तो इसका मात्र एक कारण है कि इनके दमन के लिए आवश्यक उपाय नहीं किए जा रहे हैं। नक्सलियों को खत्म करने के लिए आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है जोकि यहां देखने को नहीं मिलती है। अगर कुछ देखने को मिलता है तो सिर्फ जवानों की शहादत।
छत्तीसगढ़ में हुए हमले में बहुत ही दिल दहलाने वाली स्थिति सामने आए आई। जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। नक्सलियों में शामिल महिला नक्सलियों ने करीब 6 शहीद जवानों के गुप्तांग काट दिए। निश्चित ही यह अमानवीय कृत्य दिल दहलाने वाला है। ऐसे वारदात पहली बार सामने नहीं आई हैं पहले भी 2007 में बीजापुर जिले के सीएएफ कैंप पर नक्सलियों ने हमला किया था। जिसमें 55 जवान व एक एसपीओ शहीद हुए थे। उस समय नक्सलियों ने कुछ जवानों के धारदार हथियारों से सिर धड़ से अलग कर दिए थे। ऐसे ही टाहकवाड़ा मुठभेड़ में भी नक्सलियों ने जवानों के शव को धारदार हथियारों से काट दिया था। ऐसी बर्बरता देखने के बाद भी इनको रोकने के लिए कोई व्यापक कदम नहीं उठाया गया। और फिर एक वारदात सामने आ गई।
ऐसे हमले देश को निश्चित ही शर्मिंदा करते हैं। हमेशा जब कुछ हो जाता है तो राजनीतिक पार्टियों में बहुत जोश देखने को मिलता है । वह कड़ी नीतियां बनाने का दावा करते हैं। लेकिन होता कुछ नहीं है कुछ समय के लिए बातें होती हैं और फिर सब अपने काम में लग जाते हैं। आखिर अगर कुछ करना ही है तो हमलों का इंतजार ही क्यों करते हैं? पहले से ही ऐसी नीतियों पर काम करना चाहिए जिनसे इन स्थितियों का सामना ही ना करना पड़े। लेकिन असल दशा कुछ और ही है।
इस बात से कोई अपरिचित नहीं है कि नक्सलियों को निकट रह रहे ग्रामीणों कि मदद मिलती है। वह उनके मोहपाश में फंसे हुए या यूं कह लीजिए शायद वह मजबूर हैं। आखिर वह ग्रामीण क्यों मजबूर हैं? जिनकी मदद के हकदार वहां हमारी सुरक्षा में लगे जवान हैं। वह उन नक्सलियों की मदद करते हैं। उन्हीं की मदद से वह आए दिन जवानों पर हमला करते हैं। निश्चित ही उनके तंत्र से राज्य सरकार भी वाकिफ होगी। आखिर ऐसा क्यों है ? इसका मुख्य कारण यह है कि यह नक्सली स्थानीय निवासी हैं जिनकी उस इलाके में धाक है। क्या उन ग्रामीणों को सरकार पर भरोसा नहीं है? क्यों वे उन्हीं की सुरक्षा में लगे जवानों की जगह उन हिंसक नक्सलियों का साथ देते हैं? यहां पर सरकार को जरूरत है कि वह ग्रामीणों में यह विश्वास जगाएं की वह नक्सलियों का साथ ना दे। उनकी सुरक्षा का आश्वासन देते हुए उसका इंतजाम भी करना चाहिए। अगर नक्सलियों को ग्रामीणों की मदद मिलना बंद हो जाएगी तो बहुत हद तक उनकी गतिविधियों पर लगाम लग सकेगी। क्योंकि ग्रामीणों का इस्तेमाल कर वह सेना से संबंधित जानकारियां हासिल कर लेते हैं और ऐसी वारदातों को अंजाम देने में सफल होते हैं। लेकिन इसके लिए इंतजाम तो राज्य सरकार को ही करने होंगे।
यह सरकार की लापरवाहियों का नतीजा है कि अक्सर नक्सली ऐसी वारदातों को अंजाम देने में सफल होते हैं। क्योंकि यह जानते हुए भी की पिछले कई वर्षों से छत्तीसगढ़ का बस्तर नक्सलियों का गढ़ बना हुआ है। वहां कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए और ना ही इस पर कोई कड़े कदम उठाए गए हैं। पिछले कई दशकों से छत्तीसगढ़ में दोरनापाल से जगरगुंडा की सड़क राज्य सरकार के लिए एक चुनौती बनी हुई है। इसी रास्ते पर 2010 में एक नक्सल वारदात पहले भी हुई थी जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे। वहीं अब इस सड़क ने फिर 25 जवानों की बलि ले ली। जगरगुंडा के बासागुड़ा तक, दंतेवाड़ा के अरनपुर तक, और सुकमा के दोरनापाल तक तीन रास्ते हैं। दोरनापाल से जगरगुंडा सड़क तक की दूरी 56 किलोमीटर है। जिस पर पहले भी नक्सलियों ने कई वारदातों को अंजाम दिया है। 2008 में नक्सलियों ने सड़क काट दी थी। एक पार्टी गड्ढा पाटने निकली और नक्सलियों के एंबुश में फंस गई। जिसमें 12 जवान शहीद हो गए। अक्सर नक्सली इन रास्तों पर अपनी वारदातों को अंजाम देने में सफल होते हैं, क्योंकि वह यह जानते हैं कि इन रास्तों पर कोई पुख्ता प्रबंध नहीं किए गए हैं। जब तक इस सड़क का निर्माण ना होगा तब तक वह ऐसे ही सफल होते रहेंगे और हम अपने जवान ऐसे ही होते रहेंगे। नक्सली हिंसा से निपटने के लिए सरकार को आवश्यक इच्छाशक्ति दिखाते हुए कठोर नीतियों का निर्माण कर अपनी नीति में सुधार लाना चाहिए।
इनके हौसले इतने बुलंद हैं कि यह खुले में भी वार करने की हिम्मत रखते हैं। मार्च के महीने में डोर्नपाल-जगरगुंडा निर्माणाधीन सड़क पर दो विशेष कोबरा टीमें तैनात थी। उनमें से एक टीम करीब 70 जवानों की टुकड़ी के साथ कार्यस्थल पर पोजीशन लेने निकली, जिस दौरान नक्सलियों ने उन्हें अपने हमले का शिकार बना लिया। ध्यान देने वाली बात इसमें यह है कि नक्सली घने जंगलों से छुपकर नहीं बल्कि खुलेआम सड़कों पर भी हमला करने से चूकते नहीं है। इससे तो साफ प्रतीत होता है कि इन्हें किसी का डर नहीं है।
अभी सीआरपीएफ के उन 25 जवानों की चिता ठंडी भी नहीं हो पाई थी कि आतंकवादियों ने कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में एक सैन्य शिविर पर हमला कर दिया। उस हमले में एक कैप्टन, एक जेसीओ व एक जवान शहीद हो गए। आखिर अक्सर हो रहे ऐसे हम लोग का कारण क्या है यह ढूंढने का प्रयास कोई नहीं करता है।
अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद सरकारों की तरफ से अफसोस जताया जाता है, कई बयानबाजियां सामने आती हैं। यह देश के लिए दुखद घटना है..... देश यह सब नहीं सहेगा......इसका जवाब जरूर दिया जाएगा..... शहीद के परिवार को कुछ राशि दी जाएगी..... ऐसी बहुत सी बातें होती है। लेकिन क्या इन बातों से वह उन जवानों के परिवार का चिराग लौटा पाएंगे? क्या वह उस बुझे चिराग को दोबारा रोशन कर सकते हैं? वह ऐसा नहीं कर सकते लेकिन इन सब को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम जरूर उठा सकते हैं। ताकि जवानों को दोबारा ऐसी स्थितियों का सामना ना करना, देश को दोबारा यह मंजर ना देखना पड़े। जिसके सिर्फ वह प्रयास ही करते रह जाते हैं तब तक दोबारा एक घटना सामने आ जाती है।
आखिर देश के जवानों को इन स्थितियों का सामना क्यों करना पड़ता है ? उनपर कभी आतंकवाद का हमला, तो कभी नक्सलवाद का, कभी अपने ही उन पर पत्थरबाजी करते हैं। क्या उन्हें देश की सुरक्षा के बदले यही मिलना चाहिए उनकी सुरक्षा का दायित्व कौन उठाएगा। आए दिन हो रही ऐसी घटनाओं से राज्य सरकार व केंद्र सरकार दोनों को ही सबक लेना चाहिए और एक उचित मार्ग तलाश कर ऐसी गतिविधियों की रोकथाम करनी चाहिए। इसके लिए कड़े निर्णयों की आवश्यकता है। इसके बाद ही शायद ऐसी स्थितियों से बचा जा सकता है।

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