संवैधानिक अधिकार पर विचार
भारत एक लोकतांत्रिक देश है जिसमें हर नागरिक को अपने
विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता प्रदान है। यह स्वतंत्रता नागरिकों को संविधान
द्वारा मिली हुई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार लोगों को स्वतंत्र रुप से
अपने विचार व्यक्त करने के उद्देश्य से दिया गया था। वहीं अधिकतर लोग इस स्वतंत्रता
का दुरुपयोग करते हैं। इनमें से ज्यादातर राजनेता इसमें शामिल है किसी भी घटना पर
बेतुके बयान देना उनकी आदत में शुमार है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में भाषण की स्वतंत्रता का अधिकार है। लेकिन कभी-कभी यह
अधिकार दूसरों के प्रति अनाधिकार अतिक्रमण करता है। इस स्वतंत्रता के जरिए अक्सर
लोग किसी पर भी अनुचित टिप्पणी करने से बाज नहीं आते हैं। वह यह भूल जाते हैं कि
उनके कथन से किसी के मान सम्मान, अस्मिता को हानि
पहुंच सकती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने विचार व्यक्त करने के लिए दी गई है
न कि एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए। इस पर रोक लगाना अति आवश्यक है।
हालांकि इन अधिकारों के साथ- साथ अनुच्छेद 19 (2) में कुछ प्रतिबंध भी हैं, जिसका लोग ध्यान
नहीं रखते हैं। अगर स्पष्ट रूप से कहें तो अधिकांश लोगों को यह नहीं मालूम है कि
संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ कुछ प्रतिबंध भी लगा रखे हैं। जैसै कि राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के हित में, लोक व्यवस्था,शिष्टाचार या सदाचार के हित में, न्यायालय की अवमानना,अपराध को बढ़ावा देने के मामले में, भारत की प्रभुता और अखंडता, इनके आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा सकती है। प्रतिबंध होने के बावजूद भी लोग इन को भूल कर अपने व्यक्त करने की स्वतंत्रता का गलत इस्तेमाल करते हैं, जिसका खामियाजा उन्हें बाद में भुगतना पड़ता है।
ऐसा ही कुछ आजम खान के साथ हुआ है। पिछले साल 29 जुलाई की रात बुलंदशहर के पास राजमार्ग पर मां-बेटी के साथ
हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना को उन्होंने राजनीतिक साजिश बताया था। इस तरह की बात
करते वक्त आजम खान यह भूल गए कि नके कथन से उस परिवार पर क्या बीती होगी।इस बयान
से आजम खान ने उस परिवार की गरिमा को तार-तार कर दिया। आजम खां क्या यह कहना चाहते
थे कि उस परिवार के साथ जो भी घटित हुआ वह सिर्फ राजनीतिक साजिश का हिस्सा था। उस
परिवार ने जो भी तकलीफ झेली वह सिर्फ एक राजनीतिक साजिश को अंजाम देने के लिए थी।
इस तरह के बयान से उनके अंदर कितनी संवेदनशीलता है,यह भी सिद्ध हो
गया।
इस पर बेटी के पिता ने सर्वोच्च न्यायालय मेंएक
याचिका दकखिल कर दी । सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती के बाद आजम खां ने इसके लिए 15 दिसंबर को बिना शर्त माफी मांग ली थी और जिसे अदालत ने
स्वीकार भी कर लिया था। लेकिन क्या सिर्फ माफी मांग लेने से उनके बोले गए शब्द वापस
हो सकते हैं? बिना सोचे समझे उन्होंने जो इल्जाम उन पर लगाए वह
उसके लिए कुछ कर सकते हैं? इस तरह की अमानवीय घटना के बाद महिलाओं पर या उनके
परिवार पर क्या बीतती है इसका अंदाजा केवल पीड़ित परिवार ही लगा सकता है। बाकियों
के लिए उन पर टिप्पणी करना बहुत ही आसान है। यदि कोई उनकी तकलीफ बांट नहीं सकता है
तो कम से कम अनुचित टिप्पणियों से उनकी तकलीफ बढ़ाए भी ना।
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित परिवार की याचिका पर केंद्र
सरकार से जवाब मांगा तो सरकार के अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि पीड़ित परिवार मानहानि
के लिए दीवानी अथवा फौजदारी कानून के तहत हर्जाने की मांग कर सकता है। संवैधानिक
पीठ को भेजने का प्रस्ताव किया है।
वहीं सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने
कहा कि यदि कोई भी नेता किसी आधिकारिक मामले में अपने विचार व्यक्त करता है तो यह
उसका व्यक्तिगत विचार नहीं माना जाना चाहिए। क्योंकि वह उस वक्त पार्टी के वक्ता
के रूप में होता है। तो वह यह नहीं कह सकता कि यह उसकी व्यक्तिगत राय है। अक्सर यह
देखा गया है कि कोई भी राजनेता जब किसी मामले पर टिप्पणी करता है तो बाद में यह
कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि यह उसके व्यक्तिगत विचार हैं इसका पार्टी से कोई
लेना देना नहीं हैं। यदि वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे कि बात पर गौर किया जाए तो कहीं
ना कहीं आजम खान के पीछे उनकी पार्टी के विचार भी शामिल थे।यदि इसके लिए पार्टी को
भी जवाबदेह माना गया तो आगे से सभी पार्टियां के लिए यह सबक होगा। अन्य सभी अपने
प्रवक्ताओं के बोलने के मानक को निर्धारित करेगी।
सर्दोच्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि खान के
बयान संविधान के अनुच्छेद 21 के प्रावधानों का उल्लंघन भी करते हैं जो कहते हैं कि
किसी की निजता पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है। इसी के साथ पीठ ने संविधान पीठ
के समक्ष मामले को भेजने की अनुशंसा की और कहा कि संविधान पीठ इस पर विचार करे कि
क्या आजम खां का बयान अनुच्छेद 21 का उल्लंघन भी करता है।
ऐसा पहले भी देखा, सुना गया है कि
लोग या कोई भी नेता किसी भी मामले पर किसी भी तरह की टिप्पणी कर देते हैं। जैसे कि
31 दिसंबर 2016 की रात को
बेंगलुरु में लड़कियों के साथ हुई छेड़खानी की घटना
पर कर्नाटक के गृहमंत्री ने बयान दिया कि 'हमारे देश में
कहीं ना कहीं पश्चिमी सभ्यता दखल दे चुकी है' जिसके परिणाम
स्वरुप लड़कियां देर रात तक बाहर रहती हैं और ऐसी घटनाएं सामने आती है। उनकी बात
का समर्थन करते हुए अबू आजमी ने बयान दिया था कि ''जहां चीनी होगी,
वहां चीटियां तो आएंगी ही''। तो क्या लड़कियों में और चीनी में कोई अंतर नहीं इस
हिसाब से तो लड़कियों का पर्यायवाची चीनी भी होना चाहिए। वहीं सपा के मुलायम सिंह
यादव ने ट्रंप द्वारा महिलाओं से की गई बदसलूकी पर यह टिप्पणी की थी कि ''लड़के हैं लड़कों से तो गलतियां हो ही जाती है। अब क्या इस
बात के लिए फांसी दोगे''। इस तरह से वे अपने बयानों से एक प्रकार से अपराधियों को बढ़ावा भी देते हैं।
कहते हैं हमारे नेता युवाओं के मार्गदर्शक होते हैं
देश को चलाते हैं। यदि ऐसा मार्गदर्शन प्राप्त होगा तो आने वाली स्थितियां क्या
होंगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। संविधान पीठ के निर्णय के बाद निश्चय ही
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मानक उचित रूप में निर्धारित किए जाएंगे और इस
स्वतंत्रता का दुरुपयोग भी रोका जा सकेगा।
अक्सर लोगों के बेतुके बयान सामने आते रहते हैं।
लेकिन वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आ जाते हैं। ऐसे में अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता को पूर्ण रूप से स्पष्ट कर देना चाहिए। इस स्वतंत्रता के मानक
निर्धारित किया जाना अति आवश्यक है ताकी कोई भी किसी की गरिमा को ठेस ना पहुंचा
सके। इसके लिए कुछ बदलाव करने की जरूरत अवश्य है।


No comments:
Post a Comment