सुनसान रास्तों पर भी जरूरत एंटी रोमियो दल की

                      सुनसान रास्तों पर भी जरूरत एंटी रोमियो दल की

हमारे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बातें पहले भी होती थी, आज भी होती हैं और आगे भी होती रहेंगी। क्योंकि उनकी सुरक्षा की सिर्फ बाते ही होती हैं। यहां महिला सशक्तीकरण को लेकर बहुत से भाषण होते हैं और अभियान भी चलाए जाते हैं। लेकिन वह कुछ समय बाद सिफर साबित होते हैं। हालही में एंटी रोमियो दल के गठन के बाद कुछ हद तक मंचलों पर लगाम कसी नजर आ रही थी, लेकिन आज भी सुनसान रास्तों पर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आते हैं।

यह सब जानते हैं कि हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है। महिलाओं का जीवन उन पर निर्भर रहता है। हालांकि आज हर क्षेत्र में महिलाएं तरक्की कर सशक्ती की मिशाल कायम कर रहीं हैं । लेकिन हर महिला तरक्की का हिस्सा नहीं बन पा रही हैं क्योंकि उस पर कहीं न कहीं अभी भी रूढ़वादी परम्परा थोपी जा रहीं हैं। कुछ परिवार की वजह से नहीं बढ पाती हैं, तो कुछ रास्तों में आवारा घूम रहे मनचलों के डर से निकलती ही नहीं हैं।  

जन्म के साथ ही महिलाओं की सीमाएं निश्चित कर दी जाती है।  बचपन से ही लड़की की कमान उसके माता पिता के हाथ में होती है और शादी के बाद भी यह कमान पुरूषों के हाथ में ही होती हैं बस कमान थामने वाले मुखौटें बदल जाते हैं। शादी होते ही उन्हे पराया मान लिया जाता है उनसे कह दिया जाता है कि अब तुम किसी और की जिम्मेदारी हो। हमेशा महिलाओं को यही समझाया जाता है कि शर्म, लाज उनका गहना है। असल में तो यह गहनें बेडियों के पर्यायवाची हैं।

उनके देर तक बाहर रहने और कपड़ों पर टिप्पणी तो अब आम हो चुकि है। अगर कोई लड़का उन्हें छेड़ दे तो लोग कहते हैं ऐसे कपड़े पहनोगी तो लोग तो छेड़ेंगे ही। यहां तक कि देश के कमान जिन नेताओं के हाथ में है वह भी नहीं चूकते हैं। 31 दिसंबर की रात को बेंगलुरु में जब लड़कियों के साथ छेड़छाड़ हुई थी, तब अबू आजमी ने कहा था 'जहां चीनी होगी,वहां चीटियां तो आएंगी ही' जब देश को चलाने वालों की मानसिकता ही ऐसी होगी तो बाकियों का क्या होगा।

आज हमारा समाज लड़कियों को क्या पहनना चाहिए ये निर्धारित करने लगा है।  अगर कपड़ों की वजह से ही लड़के छेड़ते हैं  या बुरी नजर से देखते हैं तो बुलंदशहर वाली घटना का क्या? उस समय तो वह परिवार छोटे या भद्दे कपड़ों में तो नहीं था ।  तो उन्हें इस हैवानियत का सामना क्यों करना पड़ा? असल में तो महिलाओं को लेकर लोगों की मानसिकता ही बहुत हद तक मैली हो चुकि है। वह उन्हें किसी भी रुप में आजाद ही नहीं देखना चाहते हैं।

महिलाओं का क्या कोई अस्तित्व नहीं है ? क्या उसका खुद का कोई जीवन नहीं है? क्यों उसे हमेशा यह बताया जाता है कि तुम्हें क्या करना है और क्या नहीं? हमारे देश में सुरक्षा के बारे में हमेशा महिलाओं को ही क्यों सोचना पड़ता है? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनका जवाब शायद मिलना मुश्किल है?

जिस देश में शक्ति का मतलब ही महिला है, वहां महिलाओं पर ही शक्ति दिखा लोग उसे कमजोर साबित करते हैं। शायद शक्ति का अस्तित्व ही खत्म होता जा रहा है। देश की यह दशा निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण है। आए दिन महिलाओं को लेकर जाने कितने ही अपराध सामने आते हैं। कहीं दहेज के लिए उन्हें जला देना, कहीं भ्रूण हत्या कर उन्हें पैदा होने से पहले ही मार देना, कहीं उन्हें छेड़ कर उन की गरिमा को तार-तार करनाकहीं बलात्कार जैसी हैवानियत दिखाना। यहां तक कि उन्हे बेचने से भी नहीं चूकते हैं। आखिर हमारा देश किस दिशा की ओर बढ़ रहा है। सरकार चाहे कोई भी आए, कितने भी उपाय करे लेकिन हालात वैसे के वैसे बने रहते हैं।
महिलाओं की सुरक्षा को लेकर प्रयास तो बहुत किए जा रहे हैं। लेकिन यह प्रयास सफल होते नहीं दिख रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए एंटी रोमियो स्क्वायड  का गठन किया । एंटी रोमियो स्क्वायड का काम आवारा घूम रहे मनचलों को सबक सिखाना है। इनका असर स्कूल, कॉलेजों, चौराहों पर तो दिख रहा है।  लेकिन सुनसान रास्तों का क्या ? आज भी अगर महिलाओं को सुनसान रास्तों पर निकलना हो तो वह सौ बार सोचती हैं। महिलाओं की सुरक्षा के नजरिए से एंटी रोमियो दल का गठन सराहनीय है लेकिन इसका डर शोहदों में सिर्फ स्कूल-कॉलेजों के बाहर तक ही दिखता है। सुनसान रास्तों पर तो वह अपने को राजा समझ घूमते हैं। ऐसे दलों की जरूरत सुनसान रास्तों पर ज्यादा है। क्योंकि वहां कोई इंतजाम ना होने के कारण अक्सर घटनाएं सामने आती हैं। आज भी उनके हौसले सुनसान रास्तों पर बुलंद रहते हैं। प्रशासन को इस ओर ध्यान देते हुए सुनसान रास्तों पर भी कड़े इंतजाम करने चाहिए। ताकि इन मनचलों के हौसले पस्त हो सके और महिला आजादी के साथ घूम सके।

एंटी रोमियो स्क्वायड द्वारा उठाए गए कदमों से जहां कुछ सुधार हो रहे तो वहीं बेवजह लोग परेशान भी हो रहे हैं। शोहदों पर लगाम लग रही है लेकिन वहीं लोगों की परेशानियां भी बढ़ रहीं हैं। दल आवारा घूम रहे मनचलों के साथ साथ बेकसूर लोगों को भी परेशान करते पाए गए। रास्ते पर चल रहे लोग चाहे भाई बहन हों, प्रेमी युगल हों, या पति पत्नी सबको एक नजर से देखा जा रहा है । उनके साथ में इस तरह का व्यवहार किया जाता है कि मानो वह कोई गुनाहगार हो । ऐसी बहुत सी शिकायतें सामने आई साथ ही बहुत से वीडियो भी वायरल हुए जिसमें  इस दल की मनमानी साफ झलक रही है। इसका शिकार भी बेचारी महिलाएं ही हुई। उनकी वजह से उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। ऐसी सुरक्षा का क्या फायदा जिससे लोग सुरक्षित महसूस करने की जगह दहशत में जिएं।

वहीं अब इस समस्या को देखते हुए इन्हें आदेश दिया गया है कि अपनी स्वेच्छा से घूम रहे जोड़ों के साथ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी, साधारण मामलों में अभिभावकों को सूचित कर लोगों को छोड़ दिया जाए। गंभीर मामलों में गिरफ्तारी भी कर सकते हैं, साथ ही उन्हें कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग भी करनी होगी। इससे लोगों की परेशानियां कुछ कम होंगी। यदि इसके बाद भी अगर आम जनता को एंटी रोमियो स्क्वायड की वजह से परेशानी का सामना करना पड़ता है। तो प्रशासन को अवश्य ही इनके खिलाफ भी सख्त कदम उठाने चाहिए।

  कब तक सीमाओं में बंधती रहेंगी महिलाएं ?

आखिर यह सोचने वाली बात है कि ऐसे दलों की जरूरत पड़ी ही क्यों? अभी तक सुरक्षा के लिहाज से सेना का गठन होते तो देखा था। परंतु महिलाओं की सुरक्षा के लिए किसी दल का गठन शायद पहली बार हुआ हो। भविष्य में हो सकता है यह फैसला लाभकारी साबित हो। लेकिन उसके लिए कड़े कदमों की जरूरत है। लोगों को इस बात का अहसास कराना जरूरी है कि महिलाएं किसी भी रूप में कमजोर नहीं है आज वह पूर्णतः पुरुषों के बराबर सक्षम है। उन्हें किसी  के सहारे की जरूरत नहीं है लेकिन सम्मान की जरूरत अवश्य है।


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