निजता हमारा मूल अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरूवार को निजता के अधिकार पर एक अहम फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहड़ की अगुवाई वाली 9 न्यायाधीशों की पीठ ने निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार करार दिया है। यह अनुच्छेद हमारे जीवन की और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है। वहीं न्यायालय ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि निजता मानवीय गरिमा का संवैधानिक मूल है। न्यायालय के इस फैसले का आधार के इस्तेमाल पर निश्चित ही असर पड़ेगा। वहीं निजता के अधिकार के लिए लंबे समय से जंग कर रहे योद्धाओं की भी जीत हुई है।
निजता का अर्थ किसी व्यक्ति की निजी बातें या निजी जानकारियों से होता है। ऐसी बातें जो कि वह किसी के साथ नहीं बांटना चाहता है। ऐसे ही किसी अन्य व्यक्ति को भी यह अधिकार नहीं होता है कि वह किसी की निजी जानकारी बिना उसकी स्वेक्षा के ले सके। ऑक्सफोर्ड शब्दकोश के मुताबिक निजता एक ऐसी स्थिति है जिसमें किसी व्यक्ति को ना तो दूसरा व्यक्ति परेशान करता है और ना तो उस पर नजर रखता है। इसके मुताबिक निजता को 'सार्वजनिक निगाह से मुक्त होने की स्थिति' बताया गया है। इस लिहाज से कोई किसी को अपनी निजी जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है।
अब जबकि निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया है तो आधार कार्ड का क्या होता है यह सवाल उठना लाज़मी है, क्योंकि हाल ही में आधार कार्ड से जुड़ी कई याचिकाएं न्यायालय में दायर हुई थी। जिनके जरिए लोगों ने यह शिकायत रखी कि हर जगह आधार कार्ड लगाना सुरक्षित नहीं रहता है। उसके जरिये उनकी निजी जानकारियां आसानी से कोई भी निकाल सकता है। याचिकाओं का आधार था कि आधार कार्ड की वजह से निजता का हनन होता है या नहीं ? हालांकि इस पर सुनवाई न्यायालय में तीन सदस्यिय संविधान पीठ करेगी। अब जबकि निजता को मूल अधिकार माना गया है तो इस पीठ के लिए फैसला करना आसान होगा। आधार से निजता का उल्लंघन होता है कि नहीं अब इस सवाल का जवाब खोजना भी आसान हो गया। हालांकि यदि आधार कार्ड के व्यापक इस्तेमाल पर रोक लगी तो सरकारों को अपनी बहुत सी योजनाओं में उचित बदलाव करने होंगे।
सालों से निजता का अधिकार एक पहेली बना हुआ था कि आखिरकार निजता मूल अधिकार है या नहीं? क्योंकि निजता के अधिकार पर पहले हुई सुनवाइयों में 1954 में एम पी शर्मा मामले में आठ जजों की बेंच ने और 1962 में खड़क सिंह मामले में छह जजों की बेंच ने इससे असहमति जताई थी। वहीं निजता का मामला दोबारा सुर्खियों में आधार कार्ड के व्यापक इस्तेमाल की वजह से आया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार और निजी कंपनियां विभिन्न योजनाओं और सेवाओं के लिए आधार के इस्तेमाल को अनिवार्य करती जा रही थी। 2012 में कर्नाटक उच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त न्यायाधीश पुत्तस्वामी ने याचिका दायर कर सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है। वहीं फैसला उनके पक्ष में भी आया है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। साथ ही हमारे देश में सबको स्वतंत्रता से रहने की अधिकार है। सभी लोग अपना जीवन अपने तरीके से जीने के लिए स्वतंत्रता है। व्यक्तियों के लिए उनकी निजता उनका अधिकार होती है लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं था कि निजता मूल अधिकार है कि नहीं है। लेकिन अब 9 न्यायाधीशों की पीठ ने इसको मूल अधिकार बताया है इससे अब यह बात साफ हो चुकी है कि सरकार या कोई भी किसी भी व्यक्ति की निजता में खलल नहीं डाल सकते है।
इस फैसले से निश्चित ही आधार कार्ड पर अधिक प्रभाव पड़ेगा। क्योंकि अब हर जगह चाहे सरकार हो या कोई निजी कंपनियां सभी आधार कार्ड की मांग करती थी। वहीं अनिवार्य होने के कारण हर किसी को मजबूरन आधार कार्ड लगाना ही पड़ता था। यहां तक की कई बार देखा गया कि कई कंपनियों में जब कोई नौकरी के लिए जाता था तब वहां भी आइडेंटिफिकेशन और प्रूफ के लिए भी आधार कार्ड ही मांगा जाता था। लेकिन उनकी सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं होते हैं। वैसे ही सरकार भी आधार कार्ड के इस्तेमाल को व्यापक रुप से बढ़ाती जा रही थी। लेकिन उसके लिए उन्होंने कोई सिक्योरिटी के इंतजाम नहीं किए थे। आधार कार्ड के जरिए हमारी हर तरह की निजी जानकारियां इधर-उधर हो सकती थी । लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आधार कार्ड पर भी उचित कदम उठाए जा सकते हैं।
हमारे देश में डेटा सुरक्षा को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। लेकिन इस दिशा की ओर कदम उठते नहीं दिख रहे थे। लेकिन अब निजता के मूल अधिकार बनने के बाद शायद इस दिशा की ओर भी कुछ उचित बदलाव देखने को मिलें। न्यायालय के इस फैसले के बाद अब शायद लोगों की निजी जानकारियाें को सुरक्षित रखने के लिए कुछ व्यापक फैसले जरूर लिए जाएंगे। जिससे कि वह लोगों को भी सुरक्षित रख सकें और एक विश्वास पैदा कर सकें कि उनकी निजी जानकारियां सुरक्षित हैं।

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