कलिंग
उत्कल एक्सप्रेस का भयावह मंजरः
हादसा या लापरवाही.....?
उत्तर
प्रदेश में शनिवार की शाम फिर गम के बादल छा गए। चारों ओर लोगों की चीत्कार सुनने
को मिली। कई लोग अपने परिवार को ढूंढ रहे थे तो कई लोग अपने परिवार के लोगों की
हुई मृत्यु पर रोते बिलखते नजर आ रहे थे। पिछले साल 20 नवंबर 2016 को पुखरायां
रेल हादसे का
मंजर लोगों के जेहन से अभी निकला भी नहीं था कि मुजफ्फरनगर में हुए रेल हादसे में
एक बार फिर रेल की सुरक्षा को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है या यूं कहें फिर रेल
की लापरवाही का खामियाजा मासूमों को भुगतना पड़ा।शनिवार की शाम कलिंग उत्कल एक्सप्रेस
में सफर कर रहे यात्री यह सोच भी नहीं सकते थे कि उनके लिए उस शाम का मंजर इतना
भयावह होगा। यात्री रेल में बैठने के पहले यह सोचते हैं कि रेल से सफर तो उन्हें
सुरक्षित उनकी मंजिल तक पहुंचा देगा। लेकिन शायद अब उत्कल एक्सप्रेस के हादसे के
बाद लोगों के मन में रेल के सफर की तस्वीर कुछ और ही होगी। इस हादसे के बाद लोगों
के जेहन में रेल की सुरक्षा को लेकर संदेह उठना तो लाजमी है।
मुजफ्फरनगर
के खतौली में शनिवार शाम को पुरी से हरिद्वार जा रही कलिंग उत्कल एक्सप्रेस सिस्टम
की घोर लापरवाही की वजह से हादसे का शिकार हो गई। इस हादसे में 30 से
ज्यादा लोगों की मृत्यु की आशंका है। वहीं 150 से ज्यादा लोगों के घायल
होने के बारे में पता चला है। हादसे का मंजर इतना भयावह था कि ट्रैन के लगभग कोच
एक दूसरे के ऊपर चढ़े हुए थे, उन्हीं
में से एक कोच पटरी के किनारे बने एक घर में घुस गया था और दूसरा कोच एक कॉलेज में
जा घुसा था। हालांकि इस हादसे का कारण सिस्टम की घोर लापरवाही बनी है। जानकारी के
अनुसार पता चला कि ट्रैक पर आगे काम चल रहा था। जिसकी जानकारी चालक को नहीं मिल पाई
थी। इसके लिए चालक को कॉशन की सूचना दी जानी थी जोकि समय से नहीं दी गई। सूचना समय
से ना मिल पाने की वजह से यह हादसा हुआ। खतौली रेलवे स्टेशन से आगे जहां दुर्घटना
हुई वहां पटरी पर काम चल रहा था। पटरी पर प्लेटे कसी जा रही थी इस बात की पुष्टि वहां
मौके पर पड़ी मशीनें और लाल कपड़े से हो रही थी।
पुखरायां
में इंदौर-पटना एक्सप्रेस हादसे में 14 डिब्बे पटरी से उतरे थे।
जिसमें 100 से ज्यादा यात्रियों की
मौत हुई थी और 300 से ज्यादा लोगों के घायल
होने की सूचना मिली थी। पुखरायां रेल हादसे में रेलवे की कई गलतियां सामने आई थी
ट्रेन की रफ्तार भी ज्यादा थी, ट्रैक
भी टूटा हुआ था। हादसे के समय रेलवे से हुई लापरवाहियों के बाद सिस्टम पर काफी
सवाल उठे थे। उन लापरवाहियों के सामने आने के बाद यह माना जा रहा था कि आगे भविष्य
में शायद इन गलतियों से सबक लिया जाएगा और दोबारा ऐसी स्थिति नहीं उत्पन्न होने दी
जाएगी। लेकिन अब मुजफ्फरनगर में हुए और कलिंग उत्कल एक्सप्रेस हादसे ने यह साबित
कर दिया है कि रेलवे प्रशासन को मासूमों की जिंदगी का कितना मोल है। हादसों में
हुई लोगों की मौत का मुआवजा देना ही वह अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। रेलवे की
लापरवाहियों के चलते बार बार रेल हादसे हो रहे हैं जिसमें रेलवे की कई लापरवाहियाँ
उजागर हुईं हैं। इन लापरवाहियों पर कुछ समय तक बात करके वहीं छोड़ दिया जाता है और
फिर बात तब तक नही उठती है जब तक की दूसरा हादसा न हो जाए।
हालांकि
पिछले 2 साल में कई रेल हादसे सामने आए 20 मार्च, 2015 को देहरादून से वाराणसी जा रही
जनता एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी। इस हादसे में तकरीबन 34 लोग मारे गए थे। 20 नवंबर 2016 को कानपुर के पास पुखरायां में पटना-इंदौर एक्सप्रेस के 14 कोच पटरी से उतर गए थे। यह एक बड़ा रेल हादसा था जिसमें 150 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। 28 दिसंबर 2016 को अजमेर
सियालदह एक्सप्रेस के पटरी से उतर जाने से 2 लोगों की मौत हो गई और कई यात्री घायल हो गए। यह हादसा बुधवार सुबह 5 बजकर 20 मिनट पर कानपुर से पचास
किलोमीटर दूर इटावा रुट पर रुरा और मेठा स्टेशन के बीच हुआ। 22 जनवरी 2017 को आंध्रप्रदेश के विजयनगरम ज़िले
में हीराखंड एक्सप्रेस के आठ डिब्बे पटरी से उतरने की वजह से तकरीबन 39 लोगों की मौत हो गई।
वहीं 2 अगस्त 2017 को दिल्ली-हावड़ा
रेल मार्ग पर सुबह 8 बजे के
करीब एक बड़ा हादसा होने से बच गया। लखनऊ जा रही स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन के छठे और पांचवें डिब्बे की कपलिंग टूट गई थी जिसके कारण ट्रेन में झटके लग रहे
थे। वहीं ट्रेन के सतर्क चालक ने समय रहते गड़बड़ी को समझकर आपातकालीन ब्रेक लगा दिए।
यह घटना खुर्जा
जंक्शन रेलवे स्टेशन के पास हुई थी।
पिछले
दिनों हुए कई हादसों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वाकई में रेल
प्रशासन यात्रियों की सुरक्षा को लेकर सक्रिय है? क्या यात्रियों की सुरक्षा में भरपूर कदम उठाए जा
रहे हैं? साथ ही
एक यह बिंदु भी सामने आता है कि कहीं इन हादसों के पीछे कोई साजिश तो नहीं है। सरकार को इस बात की पूरी जांच
करनी चाहिए कि आखिर इतने गंभीर हुए हादसों का कारण क्या है?
वैसे तो
किसी की मौत का जिम्मेदार होने पर उसे सजा दी जाती है। वहीं इन रेल हादसों
में कई मासूमों की मौत हो गई। जिसका एकमात्र कारण रेलवे प्रशासन के कुछ लोगों की
लापरवाही थी। उन मासूमों की मौत की जिम्मेदार उनकी लापरवाही बनी। अब उनके
लिए क्या सजा निर्धारित होनी चाहिए इस बात का जवाब तो रेलवे प्रशासन ही दे पाएगा।
अब
देखने वाली बात यह है कि ऐसी लापरवाही करने वालों को सरकार क्या सजा देती है? क्या
लोगों की जान इतनी सस्ती हो गई है कि उस पर इतनी लापरवाही बरती जा सकती है? जो यात्री पुरे विश्वास के साथ रेल में बैठते
हैं उनके विश्वास के साथ तो खेल हो रहा है। अब इतनी बड़ी लापरवाही के बाद फिर प्रशासन मुआवजा देने की बात कहेगा। शायद सरकार मुआवजा तो दे सकती है लेकिन
जिन्होंने अपने परिवार के लोगों को खोया है , जिनके
परिवार उजड़े हैं क्या उनके परिवारों की खुशहाली वापस लौटा सकती है? हालांकि अब यह सवाल आम हो चुका है क्योंकि
बार-बार उठता है और
हर बार सरकार पीड़ितों के प्रति संवेदना प्रकट कर इन सवालों से बच जाती है।
अब इस
कलिंग उत्कल एक्सप्रेस हादसे के बाद रेलवे प्रशासन की जनता की ओर जवाबदेही निश्चित
ही बनती है। उन्हें जनता को यह बताना होगा कि क्या आगे आने वाले भविष्य में रेल का
सफर उनके लिए सुरक्षित रहेगा। एक तरफ रेल प्रशासन देश को मेट्रो की सुविधा देने की
बात कर रहा है, देश में
बुलेट ट्रेन चलाने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वर्तमान में मौजूद साधारण रेल
यात्रा भी लोगों के लिए सुरक्षित नहीं है। रेल प्रशासन को यात्रियों को मेट्रो
मुहैया कराने से पहले एक सुरक्षित सफर का विश्वास दिलाना होगा।
आखिर रेल
प्रशासन कब जागेगा? वह कब
समझेगा कि लोगों की जिंदगी इतनी सस्ती नहीं है। जनता में विश्वास जगाने के लिए अब
प्रशासन को इन हादसों की पूरी जांच करानी चाहिए। साथ ही रेलवे की सुरक्षा में कुछ
ठोस कदम उठाने चाहिए जिससे कि लोगों का सफर खौफ में ना बीते।

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